जन सरोकार की पत्रकारिता करने वाले अजीत अंजुम और स्मिता शर्मा का TV9 से इस्तीफा

 


मीडिया घरानों के आगे दम तोड़ती जा रही है आमजन की आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों की कलम



फोटो- पत्रकार अजीत अंजुम।


नई दिल्ली। भारत में जनसरोकार की आवाज उठाने वाले पत्रकारों को मीडिया घरानों द्वारा लाइन करने की कड़ी में आज वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम को भी इस्तीफा देना पड़ा। अजीत अंजुम दक्षिण भारत के ABCL समूह के हिंदी वर्जन TV9 भारतवर्ष में एग्जीक्यूटिव एडिटर थे। इस चैनल को हिंदी में स्टार्ट करने के दौरान अजीत अंजुम, विनोद कापड़ी, स्मिता शर्मा जैसे वरिष्ठ पत्रकारों का सहयोग रहा था। विनोद कापड़ी चैनल से पहले ही जा चुके हैं। और आज अजीत अंजुम के साथ स्मिता शर्मा ने भी स्तीफा दे दिया है। अजीत अंजुम ने व्हाट्सएप ग्रुप पर एक पोस्ट लिखा जिसमें उन्होंने अपना द्वंद साझा किया । इसके बाद ग्रुप लेफ्ट कर गए। बताया जा रहा है चैनल के मैनेजमेंट द्वारा अजीत अंजुम के एक घंटे के प्रोग्राम को 30 मिनट का कर दिया गया था। अजीत अंजुम ने बिहार के मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत को सबसे पहले जोर-शोर से उठाया था। जिससे प्रशासन हरकत में आया था।



फोटो-अजीत अंजुम और स्मिता शर्मा


अभिसार शर्मा, पूण्य प्रसून बाजपेयी को आजतक और एबीपी जैसे चैनल से बाहर किया जा चुका है। इसके बाद अब यह दोनों पत्रकारों को चैनल से साइडलाइन करने से यह प्रश्न उठने लगा है कि आखिर मीडिया घराने क्या चाहते हैं। किसके इशारे पर यह सब हो रहा है। जनता की आवाज उठाने वाले लोगों को बाहर किया जा रहा है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाली मीडिया सिर्फ लाभ और राजनीतिक दबाब में काम करने लगी है। 


लोगों की प्रतिक्रिया- घटना की जानकारी मिलते ही भारतीय जन संचार संस्थान के पूर्व छात्र अजय सिंह ने अपनी राय व्यक्त करते हुए लिखा किचैनल का इतना बड़ा चेहरा कैसे कह सकता है कि उसे साइड लाइन किया गया था! दूसरी बात, टाइमिंग तो मैनेजमेंट ही तय करेगा ना। फिर, क्या बड़ा चेहरा होने का मतलब संस्थान को अपने अनुसार चलाना होता है! सचिन कितने भी बेहतर खिलाड़ी क्यों ना हों, उन्हें कप्तान के कहे ऑर्डर पर उतरकर ही बल्लेबाजी करनी होगी। ऐसे में उनका बल्ला छोड़कर सन्यास लेना शोभा नहीं देता। वो भी पत्रकारिता जैसे 'प्रोफेशनल' पेशे में तो आपको प्रोफेशनल होना ही होगा। रही बात टीआरपी की तो अजीत सर स्वयं टीआरपी की खातिर ही महिलाओं से संबंधित एक नये शो (मुझे नाम नहीं याद है) का जोर शोर से प्रचार किए थे। और करना भी चाहिए। पेट सबके पास है। भूख सबको लगती है। बिना टीआरपी के इतना बड़ा चैनल कैसे चल सकता है। ये बात अजीत सर को भलीभांति पता होंगी। इसलिए इस्तीफे की ये वज़हें वज़नदार नहीं हैं। भले ही ये बातें स्वयं अंजुम सर और शर्मा मैम ही क्यों न बताएं... फिलहाल, दो बेहतरीन सख़्सियत का यूं इस्तीफा देना, आश्चर्यचकित करने वाला है।


 


अजय सिंह के जबाब में आईआईएमसी से पासआउट एक अन्य पत्रकार मुरारी त्रिपाठी लिखते हैं कि महिलाओं वाला मुद्दा तो नहीं पता मुझे। लेकिन एक्जीक्यूट एडिटर पर एक तरफा निर्णय थोप दिया जाना सही नहीं है। पत्रकारिता एक टीम वर्क है। तानाशाही फैसलों से सिर्फ मुनाफा कमाया जा सकता है। पत्रकारिता नहीं की जा सकती। बाकी रही मैनजमेंट की बात तो देख लीजिए कुछ अलग करने की बात करने वाला चैनल पाकिस्तान की विषकन्या जैसा प्रोग्राम चलाने लगा है। एडिटोरियल लाइन में आया यही बदलाव इन लोगों के बीच विवाद का विषय था। परिणाम ये रहा कि फॉउंडिंग एडिटर्स हार गए और मैनेजमेंट जीत गया। मैनेजमेंट से जीता ही नहीं जा सकता। नॉम चोम्स्की पहले ही बता गए हैं विज्ञापन बाजार और प्रोपगेंडा के बिना मुनाफा हो ही नहीं सकता। दुनिया मुनाफे पर टिकी है। पत्रकारिता भी।


टीवी9 ग्रुप- TV9 की शुरुआत 2004 में हुई थी और इसका स्वामित्व एसोसिएटेड ब्रॉडकास्टिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड (ABCL) के पास है। जिसके भारत में विभिन्न भाषाओं में सात टेलीविज़न स्टेशन हैं। बाद में ABCL ने अपनी हिस्सेदारी Alanda Media और Entertainments Private Limited को बेच दी। दक्षिण भारत के बाद उत्तर भारत में पकड़ बनाने के लिए TV9 ने हिंदी न्यूज़ चैनल "TV9 भारतवर्ष" स्टार्ट किया था।